प्राइवेट अस्पताल में कोरोना मरीजों का इलाज कराना हुआ सबसे महंगा, अगर सरकार फिक्स रेट रखती तो टाली जा सकती हैं कई मौतें

देश में दोबारा से शुरू हुए कोरोना माहामारी ने एक बार फिर से तबाही मचानी शुरू कर दी है। कोरोना संकट से जूझ रहे पूरे देश के अस्पतालों में कोरोना से निपटने के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में कमी है। साथ ही निजी अस्पतालों के लिए सरकार की ओर से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं है।

देश में दोबारा से शुरू हुए कोरोना माहामारी ने एक बार फिर से तबाही मचानी शुरू कर दी है।  कोरोना संकट से जूझ रहे पूरे देश के अस्पतालों में कोरोना से निपटने के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में कमी है। साथ ही निजी अस्पतालों के लिए सरकार की ओर से कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं है। जिसके चलते कोरोना से ग्रसित मरीज को महामारी के दौर में इलाज पर ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे है निजी अस्पतालों ने मरीज के इलाज के लिए ज्यादा पैसे चार्ज किए। यह बात संसदीय समिति ने शनिवार को अपनी रिपोर्ट में कही गई। 

वहीं, संसदीय समिति ने कहा कि कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच सरकारी अस्पतालों में बेड की कमी थी। साथ ही इस महामारी के इलाज के लिए विशिष्ट दिशानिर्देशों का अभाव था, जिसके चलते निजी अस्पतालों ने काफी बढ़ा-चढ़ाकर पैसे लिए जा रहे हैं।  समिति ने कहा कि अगर कोरोना के इलाज के लिए निजी अस्पतालों के लिए कोई फिक्स रेट तय किए होते तो कई मौतों को टाला जा सकता था।

स्वास्थ्य संबंधी स्थायी संसदीय समिति के अध्यक्ष राम गोपाल यादव ने राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू को ‘कोविड-19 महामारी का प्रकोप और इसका प्रबंधन' की रिपोर्ट सौंपी। सरकार द्वारा कोविड-19 महामारी से निपटने के संबंध में यह किसी भी संसदीय समिति की पहली रिपोर्ट है। समिति ने कहा कि 1.3 अरब की आबादी वाले देश में स्वास्थ्य पर खर्च 'बेहद कम है' और भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की नाजुकता के कारण महामारी से प्रभावी तरीके से मुकाबला करने में एक बड़ी बाधा आई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसलिए समिति सरकार से सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में अपने निवेश को बढ़ाने की सिफारिश करती है। समिति ने सरकार से कहा कि दो साल के भीतर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.5 प्रतिशत तक के खर्च के राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करें क्योंकि वर्ष 2025 के निर्धारित समय अभी दूर हैं और उस समय तक सार्वजनिक स्वास्थ्य को जोखिम में नहीं रखा जा सकता है। 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में 2025 तक जीडीपी का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवा पर सरकारी खर्च का लक्ष्य रखा गया है जो 2017 में 1.15 प्रतिशत था। समिति ने कहा कि यह महसूस किया गया कि देश के सरकारी अस्पतालों में बेड की संख्या कोविड और गैर-कोविड मरीजों की बढ़ती संख्या के लिहाज से पर्याप्त नहीं थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी अस्पतालों में कोविड के इलाज के लिए विशिष्ट दिशानिर्देशों के अभाव के कारण मरीजों को अत्यधिक शुल्क देना पड़ा। समिति ने जोर दिया कि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और महामारी के मद्देनजर सरकारी और निजी अस्पतालों के बीच बेहतर साझेदारी की जरूरत है। समिति ने कहा कि जिन डॉक्टरों ने महामारी के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान दे दी, उन्हें शहीद के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए और उनके परिवार को पर्याप्त मुआवजा दिया जाना चाहिए।

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